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मंदिरों की संपत्ति से हो सकता देश कर्ज मुक्त
संजय साहू
जबलपुर
प्राचीन समय से भारत जैसे विशाल देश में भगवान के प्रति गहरी श्रद्धा रही है, मान्यताओं के अनुसार आदमी अपने स्वभाव अनुरू मनोकामना पूर्ण होने पर भगवान को कोई न कोई भेंट अर्पण करता है और यही कारण है कि देश के अनेक मंदिर ऐसे हैं जहां बेहिसाब संपत्ति रखी हुई, इस संपत्ति का न तो कोई उपयोग हो रहा है और न ही वह किसी आदमी या संस्था के काम आ रही है, अरबों खरबों रूपये की इस संपत्ति पर सरकार का भी कोई नियंत्रण नहीं है।
आज हमारी अर्थ व्यवस्था विश्व की अर्थ व्यवस्था से थोड़ी भिन्न होने के साथ विश्व की सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था में शुमार है लेकिन सत्ता लोलुप नेताओं ने इस समाज को ही नहीं वरन् भारत की वर्जनाओं को भी तोड़ा है, उसी का परिणाम है कि आज देश के ऊपर अरबों रूपये का कर्ज लदा हुआ है, प्रत्येक व्यक्ति देश को इस कर्ज से मुक्त तो होना देखना चाहता है लेकिन खुद का कोई योगदान इसमें नहीं करता और सरकार से आशा लगाये रहता है, कि वह ही इस देश को कर्ज मुक्त करे, जबकि वोटों की भूखी सरकार को इससे कोई सरोकार नहीं है कि कभी सोने की चिडिय़ा कहा जाने वाला हिन्दुस्तान आज विश्व के उन तमाम देशों द्वारा मिलने वाले कर्ज पर निर्भर हो गया है जो हर लिहाज से हमसे छोटे होते हुये भी विकासशील देश बने हुये हंै। उनके द्वारा मिलने वाले कर्ज से हम दिखाते हैं कि भारत शक्ति संपन्न हो रहा है आयात ज्यादा और निर्यात कम कर रहा है, हमारी सरकार उद्योगपतियों के कहने पर चल रहीं हैं तो उसका कारण है कि उनके द्वारा दिया जाने वाले टैक्स से हमारे मंत्री विदेश यात्रा और महंगी कारों में घूम रहें हैं। पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर ही सरकार अपनी नीतियों में बदलाव कर रही है, क्योंकि इन पूंजीपतियों से जो टैक्स मिल रहा है उससे वह विदेशी बैंको द्वारा लिया गया ऋण का ब्याज चुका रही है। जबकि ऐसा नहीं कि किसी सरकार में इच्छाशक्ति हो तो वह इस देश को कर्ज से मुक्त कर गरीबों को न्याय दिला सकती है उसके लिये आवश्यकता है हिम्मत और खुद्दारी की तथा अपनी बात कहने का साहस होने की, और एक बार पुन: यह मान लिया जाये कि यह देश भगवान भरोसे हो गया है तो बहुत कुछ हो सकता है तथा जिस भगवान पर हम हिन्दुस्तानी सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं, तथा सबकुछ मांगते हैं उसी के द्वारा एक बार फिर भारत को कर्ज से मुक्ति दिला सकते हैं।
देखा जाये तो अनेक बार लुटने के बाद आज भी हमारा हिन्दुस्तान सोने की चिडिय़ा कहा जा सकता है, क्योंकि देश में ऐसे मंदिर हैं जहां पर टनों की संख्या में सोना पड़ा हुआ है इस सोने का उपयोग कोई नहीं कर पा रहा है,आखिर क्यों तो इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है, या फिर हो सकता है कि हमारी सरकारों में इच्छा शक्ति की कमी हो जिसके कारण इस सोने का उपयोग हम अपने ही देश के विकास में नहीं कर पा रहे।
जानकारों की माने तो केरल के एक मंदिर में आज भी विगत दो साल से सिर्फ गिनती ही चल रही है कि इस मंदिर में दान दिया जाने वाला सोना कितना है इसी प्रकार दक्षिण के ही सुप्रसिद्ध बाला जी मंदिर में बेशुमार चढ़ावा आता है उस चढ़ावे को गिनने के लिये अलग से आदमी लगे हुये हैं और रोज की गिनती तक नहीं कर पा रहें हैं। इसी प्रकार शिर्डी के साईंबाबा का मंदिर हो या देश के विभिन्न स्थानों पर बिराजित प्रतिमाएं उनके ऊपर इतना चढ़ावा है कि इस देश को कर्ज से मुक्त किया सकता है तथा आम आदमी के लिये भी बचाया जा सकता है, लेकिन हम शायद भगवान की बनाई हुई उस माया के जाल में फंसे हुये हैं, जहां पर खुद भूखे रह जाते हैं किन्तु भगवान को चढ़ाये जाने वाले पैसों का उपयोग हम अपनी भूख मिटाने के लिये नहीं कर पा रहे हैं। इसमें कुछ दोष उन महात्माओं को भी जाता है जो पूजन भजन के लिये तो कहते हैं किन्तु मंदिर में चढऩे वाली चढ़ोत्री को अपना मानकर चलते हैं, और उसकी रक्षा करते हैं, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिये। मंदिरों में चढ़ाये जाने वाले पैसा का सद््उपयोग सरकार को करने दिया जाये तो हिन्दुस्तान का एक भी बच्चा या परिवार का सदस्य भूख से दम नहीं तोड़ पायेगा। हर नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हो सकते हैं। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विदेशों में जमा काला धन वापिस आने पर प्रत्येक हिन्दुस्तानी के खाते में 15 लाख रूपये जमा होने की बात कही थी वह सच साबित हो सकती है, उसके लिये उन्हें विदेशों में भटकने की बजाय अपने देश की ही बेकार पड़ी संपत्तियों पर ही गौर करना होगा, तभी भारत के नागरिकों के अच्छे दिन आ सकते हैं।


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