कौन सी दीमक लगी है कांग्रेस को खत्म करने...
.पुराने नेताओं की कार्यप्रणाली पर उठने लगे सवाल
.30 साल से सत्ता से बाहर है शहर में कांग्रेस
.आखिर क्यों इस सवाल का जबाव नहीं है किसी के पास
जबलपुर।
एक समय था जब कांग्रेस का पूरा देश में सम्राज्य था। काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कांग्रेस का तिरंगा लहरा रहा था। समय बीतता गया और ये बात पुरानी होती गई। वर्तमान हालात यह है कि जिन गिन-चुने राज्यों में कांग्रेस की सरकार है, उसे बचाने के लिये भी जद्दोजहद हो रही है। इसका मूल कारण क्या है, इस पर कोई नेता बात नहीं करना चाहता। जबकि कांग्रेस जहां से हारती है वहां निरंतर हारती ही चली जाती है फिर जबलपुर की ही बात क्यों न हो। यहां भी कांग्रेस विगत 30 वर्ष से नहीं है। यहां पर वर्ष 1996 के बाद से लगातार भारतीय जनता पार्टी का लोकसभा में कब्जा बना हुआ है। इसी बीच 5 चुनाव हो चुके हैं, लगभग यही हालात विधानसभा क्षेत्रों के बने हुये हैं।
गौरतलब हो कि जबलपुर विधानसभा की चारों सीट पर बीते 30 वर्षों लगातार भारतीय जनता पार्टी जीतती चली है, इसमें पश्चिम और पूर्व विधानसभा के साथ एक बार उत्तर विधानसभा में बदलाव जरूर देखा गया था। लेकिन इसके बाद भी कोई आशातीत सफलता कांग्रेस को नहीं मिली है। लगातार हार के बाद भी कांग्रेस के नेताओं में कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा है। अपनी ढपली अपना राग अलापने में माहिर कांग्रेस नेता एक दूसरे की टांग खींचने में लगे हुये हैं।
गुटबाजी हावी
जानकारों का कहना है कि प्रदेश ही नहीं जबलपुर में भी कांगे्रेस के वोटबैंक में ज्यादा अंतर नहीं हैं। 2 से 5 फीसदी अंतर को कम करने के लिये कांग्रेस के वरिष्ठ कभी ध्यान नहीं दिया है। यही कारण है कि आज कांग्रेस की हालात और पतली होती जाती जा रही है। गुटबाजी का शिकार कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं द्वारा अपने पीछे दूसरी पंक्ति को खड़ा नहीं होने दिया है, हर कोई स्वयंभू नेता बनना चाहता है, कोई अपने बेटे को चुनाव लड़ा रहा है तो कोई अपने भतीजे को लड़ाना चाहता है। ये वो कारण जिससे कांग्रेस का दरी उठाने वाला कार्यकर्ता आज मायूस सा होकर घर पर बैठ गया है।
कार्यकर्ता जोड़ने की नहीं हुई कवायद
बताया जाता है कि कांग्रेस में जितने भी नेता हैं वह सिर्फ स्वयं का वर्चस्व चाहते हैं। उनके आगे-पीछे घूमने वाले लोग भी सिर्फ और सिर्फ नेता के इशारों पर ही काम करते हैं, यहां पर पार्टी के हित में सोचने वाले नेताओं ने कभी भी पार्टी के सिपाहसलार कहे जाने वाले कार्यकर्ताओं को नहीं जोड़ा है। यही कारण है कि आज युवा कार्यकर्ता कांग्रेस से जुड़ने की बजाय दूरी बना रहा है।
नहीं मिलता महत्व
वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की माने तो हर विधानसभा में कुछ नाम हैं जिनके दम पर ही पूरी कांग्रेस चल रही है, यह वो नाम हैं जो जमीन से नहीं जुड़े हुये हैं, सिर्फ वरिष्ठ नेताओं के आगमन पर मंचासीन जरूर नजर आते हैं, इनको न तो किसी आंदोलन से मतलब होता है, और न ही जन विकास के मुद्दों से। केन्द्रीय नेतृत्व के सहारे ही अपनी राजनैतिक पारी को आगे बढ़ा रहे हैं। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि इस प्रकार के नेताओं को ही केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा महत्व दिया जाता है। जबकि छोटा- कार्यकर्ता या आंदोलन में सहभागी की भूमिका निभाने वाले को महत्व नहीं मिल रहा है।
नहीं हुआ कोई बड़ा सम्मेलन
कहा जाता है कि कार्यकर्ता का मनोवल उसके नेता ही बढ़ाते हैं, लेकिन देखने में आया है कि बीते अनेक सालों से कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिये कोई कार्यकर्ता सम्मेलन तक आयोजित नहीं किया गया है। कांग्रेस की दुर्दशा का एक कारण यह भी माना जा सकता है। जबकि ऐंसा नहीं कि कांग्रेस में जितने भी नेता हैं वह किसी प्रकार से आर्थिक रूप से कमजोर हैं। यहां तक कि अगर कहीं कोई कार्यक्रम आयोजित भी किया जा रहा है, या किया गया है तो उसका महत्व उस आयोजनकर्ता तक ही सीमित रहा है न कि पार्टी को इसका लाभ दिलाया गया है।
इनका कहना है
हॉ ये बात सही है कि पार्टी में कार्यकर्ताओं को महत्व नहीं दिया गया है यही कारण है कि बीते 30 वर्ष से पार्टी शहर में हारती जा रही है।
राजेन्द्र यादव
वरिष्ठ कांग्रेस नेता
आपका सवाल बड़ा महत्वपूर्ण है, कि आखिर क्यों शहर में कांग्रेस निरंतर हार रही है, इस पर समीक्षा होगी उसके बाद ही बता पाउंगा।
मदन तिवारी
वरिष्ठ कांग्रेस नेता
इस सवाल पर कांग्रेस को विचार करना होगा जो कि अभी तक नहीं हुआ है, जब तक विचार नहीं किया जायेगा तब तक जबाब देना नामुमकिन है।
कौशल्या गोंटिया
पूर्व मंत्री
केन्द्रीय नेतृत्व तथा स्थानीय नेताओं को इस पर विचार करना चाहिये आखिर क्यों ये स्थिति बनी है। जब तक विचार नहीं किया जायेगा तब तक हालातों को बदल पाना मुश्किल होगा। इसके लिये युवा लॉबी को आगे लाना होगा।
दिनेश यादव
नगर अध्यक्ष कांग्रेस
फैक्ट फाईल
. वर्ष 1996 से कांग्रेस ने लोकसभा सीट नहीं जीती
. वर्ष 1989 से लगातार भाजपा का चारों विधानसभा सीट पर कब्जा बना हुया है।
. वर्ष 2008 में कांग्रेस ने पूर्व विधानसभा को जीता था।
. वर्ष 2013 के चुनाव में कांग्रेस ने पश्चिम विधानसभा में बाजी मारी।
. जहां हारी तो हार का अंतर निरंतर बढ़ता ही गया।
. जीत का अंतर जरूर कम हुआ है।
-----------------------------------------------
.पुराने नेताओं की कार्यप्रणाली पर उठने लगे सवाल
.30 साल से सत्ता से बाहर है शहर में कांग्रेस
.आखिर क्यों इस सवाल का जबाव नहीं है किसी के पास
जबलपुर।
एक समय था जब कांग्रेस का पूरा देश में सम्राज्य था। काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कांग्रेस का तिरंगा लहरा रहा था। समय बीतता गया और ये बात पुरानी होती गई। वर्तमान हालात यह है कि जिन गिन-चुने राज्यों में कांग्रेस की सरकार है, उसे बचाने के लिये भी जद्दोजहद हो रही है। इसका मूल कारण क्या है, इस पर कोई नेता बात नहीं करना चाहता। जबकि कांग्रेस जहां से हारती है वहां निरंतर हारती ही चली जाती है फिर जबलपुर की ही बात क्यों न हो। यहां भी कांग्रेस विगत 30 वर्ष से नहीं है। यहां पर वर्ष 1996 के बाद से लगातार भारतीय जनता पार्टी का लोकसभा में कब्जा बना हुआ है। इसी बीच 5 चुनाव हो चुके हैं, लगभग यही हालात विधानसभा क्षेत्रों के बने हुये हैं।
गौरतलब हो कि जबलपुर विधानसभा की चारों सीट पर बीते 30 वर्षों लगातार भारतीय जनता पार्टी जीतती चली है, इसमें पश्चिम और पूर्व विधानसभा के साथ एक बार उत्तर विधानसभा में बदलाव जरूर देखा गया था। लेकिन इसके बाद भी कोई आशातीत सफलता कांग्रेस को नहीं मिली है। लगातार हार के बाद भी कांग्रेस के नेताओं में कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा है। अपनी ढपली अपना राग अलापने में माहिर कांग्रेस नेता एक दूसरे की टांग खींचने में लगे हुये हैं।
गुटबाजी हावी
जानकारों का कहना है कि प्रदेश ही नहीं जबलपुर में भी कांगे्रेस के वोटबैंक में ज्यादा अंतर नहीं हैं। 2 से 5 फीसदी अंतर को कम करने के लिये कांग्रेस के वरिष्ठ कभी ध्यान नहीं दिया है। यही कारण है कि आज कांग्रेस की हालात और पतली होती जाती जा रही है। गुटबाजी का शिकार कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं द्वारा अपने पीछे दूसरी पंक्ति को खड़ा नहीं होने दिया है, हर कोई स्वयंभू नेता बनना चाहता है, कोई अपने बेटे को चुनाव लड़ा रहा है तो कोई अपने भतीजे को लड़ाना चाहता है। ये वो कारण जिससे कांग्रेस का दरी उठाने वाला कार्यकर्ता आज मायूस सा होकर घर पर बैठ गया है।
कार्यकर्ता जोड़ने की नहीं हुई कवायद
बताया जाता है कि कांग्रेस में जितने भी नेता हैं वह सिर्फ स्वयं का वर्चस्व चाहते हैं। उनके आगे-पीछे घूमने वाले लोग भी सिर्फ और सिर्फ नेता के इशारों पर ही काम करते हैं, यहां पर पार्टी के हित में सोचने वाले नेताओं ने कभी भी पार्टी के सिपाहसलार कहे जाने वाले कार्यकर्ताओं को नहीं जोड़ा है। यही कारण है कि आज युवा कार्यकर्ता कांग्रेस से जुड़ने की बजाय दूरी बना रहा है।
नहीं मिलता महत्व
वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की माने तो हर विधानसभा में कुछ नाम हैं जिनके दम पर ही पूरी कांग्रेस चल रही है, यह वो नाम हैं जो जमीन से नहीं जुड़े हुये हैं, सिर्फ वरिष्ठ नेताओं के आगमन पर मंचासीन जरूर नजर आते हैं, इनको न तो किसी आंदोलन से मतलब होता है, और न ही जन विकास के मुद्दों से। केन्द्रीय नेतृत्व के सहारे ही अपनी राजनैतिक पारी को आगे बढ़ा रहे हैं। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि इस प्रकार के नेताओं को ही केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा महत्व दिया जाता है। जबकि छोटा- कार्यकर्ता या आंदोलन में सहभागी की भूमिका निभाने वाले को महत्व नहीं मिल रहा है।
नहीं हुआ कोई बड़ा सम्मेलन
कहा जाता है कि कार्यकर्ता का मनोवल उसके नेता ही बढ़ाते हैं, लेकिन देखने में आया है कि बीते अनेक सालों से कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिये कोई कार्यकर्ता सम्मेलन तक आयोजित नहीं किया गया है। कांग्रेस की दुर्दशा का एक कारण यह भी माना जा सकता है। जबकि ऐंसा नहीं कि कांग्रेस में जितने भी नेता हैं वह किसी प्रकार से आर्थिक रूप से कमजोर हैं। यहां तक कि अगर कहीं कोई कार्यक्रम आयोजित भी किया जा रहा है, या किया गया है तो उसका महत्व उस आयोजनकर्ता तक ही सीमित रहा है न कि पार्टी को इसका लाभ दिलाया गया है।
इनका कहना है
हॉ ये बात सही है कि पार्टी में कार्यकर्ताओं को महत्व नहीं दिया गया है यही कारण है कि बीते 30 वर्ष से पार्टी शहर में हारती जा रही है।
राजेन्द्र यादव
वरिष्ठ कांग्रेस नेता
आपका सवाल बड़ा महत्वपूर्ण है, कि आखिर क्यों शहर में कांग्रेस निरंतर हार रही है, इस पर समीक्षा होगी उसके बाद ही बता पाउंगा।
मदन तिवारी
वरिष्ठ कांग्रेस नेता
इस सवाल पर कांग्रेस को विचार करना होगा जो कि अभी तक नहीं हुआ है, जब तक विचार नहीं किया जायेगा तब तक जबाब देना नामुमकिन है।
कौशल्या गोंटिया
पूर्व मंत्री
केन्द्रीय नेतृत्व तथा स्थानीय नेताओं को इस पर विचार करना चाहिये आखिर क्यों ये स्थिति बनी है। जब तक विचार नहीं किया जायेगा तब तक हालातों को बदल पाना मुश्किल होगा। इसके लिये युवा लॉबी को आगे लाना होगा।
दिनेश यादव
नगर अध्यक्ष कांग्रेस
फैक्ट फाईल
. वर्ष 1996 से कांग्रेस ने लोकसभा सीट नहीं जीती
. वर्ष 1989 से लगातार भाजपा का चारों विधानसभा सीट पर कब्जा बना हुया है।
. वर्ष 2008 में कांग्रेस ने पूर्व विधानसभा को जीता था।
. वर्ष 2013 के चुनाव में कांग्रेस ने पश्चिम विधानसभा में बाजी मारी।
. जहां हारी तो हार का अंतर निरंतर बढ़ता ही गया।
. जीत का अंतर जरूर कम हुआ है।
-----------------------------------------------
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें