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मार्च, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
कहां जा रहा सरकार द्वारा लिया जाने वाला टैक्स का पैसा मध्यप्रदेश में जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी थी उस समय प्रदेश पर 55 हजार करोड़ का कर्ज था। जो अब बढ़कर लगभग 1 लाख 30 हजार करोड़ रूपये हो गया है। यह असमानता महज 12 सालों में आई है। यह कर्ज हमेशा विकास के नाम पर लिया जाता रहा है। हालांकि सरकार द्वारा विकास के अनेक काम प्रस्ताव में लाये गये हैं। परंतु ऐंसा कोई कार्य नहीं हो पाया जिससे ये लगे कि प्रदेश मे विकास की गति पकड़ रही है। सड़क का विकास हुआ, उसमें टोल टैक्स लिया जा रहा है। बिजली का विकास हुआ है, इसमें अनाप-शनाप पैसा लेकर आम उपभोक्ताओ की कमर तोड़ी जा रही है। फिर आखिर कर्ज का पैसा जा कहां रहा है। यह एक विचारणीय प्रश्न है। सरकार के मुताबिक प्रदेश के प्रत्येक नागरिक पर 14 हजार रूपये का कर्ज है। वहीं दूसरी तरफ सरकार कहती है कि प्रत्येक व्यक्ति की सालाना आय में वृद्धि हुई है। जब सलाना आय में वृद्धि हो रही है, फिर कर्ज की आवश्यकता क्यों पड़ रही है। इतना ही नहीं प्रदेश में सबसे महंगी बिजली मप्र में बेची जा रही है। इसके बाद भी घाटा होने की बात कही जा रही है। पेट्रोल और डीजल में प्रदे...
ये कैसी देशभक्ति एक समय था जब देशभक्ति की एक परिभाषा हुआ करती थी, जिसमें लोग अपने देश के लिये मरने-मिटने तक को तैयार रहते थे। परंतु विगत वर्षों ने इस परिभाषा को बदल कर रख दिया है। सही मायने में देशभक्ति की मिशाल देने वाले ही नहीं रहे हैं। हाल में कुछ घटनायें ऐंसी हुई हैं जिन पर देश में बवाल मच गया था। सबसे पहली घटना वरिष्ठ समाजसेवी अन्ना हजारे जी का आंदोलन। जिसमें उन्होंने एक पार्टी को जन्म दे दिया। वही पार्टी आज आमआदमी की जगह खास आदमी बनकर लोगों को उल्लू बनाने का काम कर रही है। दूसरी घटना निर्भया काण्ड जिसने पूरे देश को झकझौर कर रख दिया। तीसरी घटना अखलाक बीफ काण्ड जिसने पूरे उत्तरप्रदेश में दंगे करवा दिये। ये महज घटनाऐं थीं लेकिन इसे मीडिया ने इतना परोसा कि आम-आदमी भी गुस्से में आग बबूला हो गया। इन घटनाओं में जहां बुद्धिजीवियों तथा मानवता वादी संगठनों ने उनको मिले पुरूस्कार तक वापिस करवा दिये। यह कहा जाने लगा कि हिन्दुस्तान में रहना खतरे से खाली नहीं है। ये वही बुद्धिजीवी हैं जिन्हें सिर्फ एक समुदाय विशेष पर हो रहे अत्याचार की कहानी परोसनी है, ताकि इनका मतलब सिद्ध हो सके। वहीं दूस...
निजी संस्थाओं में काम करने वालों पर कब मेहरबान होगी सरकार 1 मार्च को मप्र सरकार का बजट वित्त मंत्री जयंत मलैया द्वारा प्रस्तुत किया गया। इस बजट में किसानों से लेकर शासकीय कर्मचारियों का ध्यान रखा गया। जो कि सराहनीय माना जाता सकता है। जहां किसानों को फसल बीमा से जोड़ने का प्रावधान रखा तो वहीं प्रदेश में कार्यरत लगभग साढ़े चार लाख शासकीय कर्मियों को केन्द्र सरकार की तरह 7 वें वेतनमान का लाभ दिया गया। जिसे होली का बोनस भी माना जा रहा है। इन सब के बाबजूद एक तबका ऐंसा है, जिसकी अनदेखी प्रत्येक सरकार निरंतर करती जा रही है। यह बो तबका है जो निजी संस्थाओं में कार्यरत है। जिसमें अस्पताल, दूध डेरी, किराना दुकान, कपड़ा दुकान, के साथ होटल में काम करने वाले है। इनकी तनखाह हर माह 4-5 हजार रूपये होती है। इसी तनखाह में वो अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करने मजबूर है। गरीब वस्तियों में रहने वाला इस तबके के पास न तो गरीबी रेखा का कार्ड है, और न ही सरकार की किसी योजनाऔं में इनको लाभांवित किया जा रहा है। ये तबका न तो गरीब है, न ही माध्यमवर्गीय और न ही क्रीमीलेयर। समूचे प्रदेश में लगभग 8 से 10 लाख लोग ऐसे ...