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कहां जा रहा सरकार द्वारा लिया जाने वाला टैक्स का पैसा


मध्यप्रदेश में जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी थी उस समय प्रदेश पर 55 हजार करोड़ का कर्ज था। जो अब बढ़कर लगभग 1 लाख 30 हजार करोड़ रूपये हो गया है। यह असमानता महज 12 सालों में आई है। यह कर्ज हमेशा विकास के नाम पर लिया जाता रहा है। हालांकि सरकार द्वारा विकास के अनेक काम प्रस्ताव में लाये गये हैं। परंतु ऐंसा कोई कार्य नहीं हो पाया जिससे ये लगे कि प्रदेश मे विकास की गति पकड़ रही है। सड़क का विकास हुआ, उसमें टोल टैक्स लिया जा रहा है। बिजली का विकास हुआ है, इसमें अनाप-शनाप पैसा लेकर आम उपभोक्ताओ की कमर तोड़ी जा रही है। फिर आखिर कर्ज का पैसा जा कहां रहा है। यह एक विचारणीय प्रश्न है। सरकार के मुताबिक प्रदेश के प्रत्येक नागरिक पर 14 हजार रूपये का कर्ज है। वहीं दूसरी तरफ सरकार कहती है कि प्रत्येक व्यक्ति की सालाना आय में वृद्धि हुई है। जब सलाना आय में वृद्धि हो रही है, फिर कर्ज की आवश्यकता क्यों पड़ रही है। इतना ही नहीं प्रदेश में सबसे महंगी बिजली मप्र में बेची जा रही है। इसके बाद भी घाटा होने की बात कही जा रही है। पेट्रोल और डीजल में प्रदेश सरकार द्वारा सर्वाधिक 32 प्रतिशत तक टैक्स लिया जा रहा है। इन सबके बावजूद प्रदेश सरकार को क्यों कर्ज में डुबोया जा रहा है। यह एक विचारणीय प्रश्न है। जहां बात विकास की करें तो प्रदेश का एक भी महकमा ऐंसा नहीं है जिसमें व्यापक भ्रष्टाचार न हो रहा हो। चारों तरफ देखकर लगता है कि सरकारी कर्मचारी लूट-खसोट में व्यस्त है। विकास के नाम पर कागजी घोड़े दौड़ रहे हैं। 

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