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निजी संस्थाओं में काम करने वालों पर कब मेहरबान होगी सरकार
1 मार्च को मप्र सरकार का बजट वित्त मंत्री जयंत मलैया द्वारा प्रस्तुत किया गया। इस बजट में किसानों से लेकर शासकीय कर्मचारियों का ध्यान रखा गया। जो कि सराहनीय माना जाता सकता है। जहां किसानों को फसल बीमा से जोड़ने का प्रावधान रखा तो वहीं प्रदेश में कार्यरत लगभग साढ़े चार लाख शासकीय कर्मियों को केन्द्र सरकार की तरह 7 वें वेतनमान का लाभ दिया गया। जिसे होली का बोनस भी माना जा रहा है। इन सब के बाबजूद एक तबका ऐंसा है, जिसकी अनदेखी प्रत्येक सरकार निरंतर करती जा रही है। यह बो तबका है जो निजी संस्थाओं में कार्यरत है। जिसमें अस्पताल, दूध डेरी, किराना दुकान, कपड़ा दुकान, के साथ होटल में काम करने वाले है। इनकी तनखाह हर माह 4-5 हजार रूपये होती है। इसी तनखाह में वो अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करने मजबूर है। गरीब वस्तियों में रहने वाला इस तबके के पास न तो गरीबी रेखा का कार्ड है, और न ही सरकार की किसी योजनाऔं में इनको लाभांवित किया जा रहा है। ये तबका न तो गरीब है, न ही माध्यमवर्गीय और न ही क्रीमीलेयर। समूचे प्रदेश में लगभग 8 से 10 लाख लोग ऐसे हैं जो इस तबके में आते हैं। असंगठित क्षेत्र के ये मजदूर किसी के सामने अपना दुखड़ा भी नहीं रो पाते हैं। इनका न तो पीएफ एकाउंट होता है, और न ही सरकार द्वारा चलाई जा रही स्कीमों में ये पात्रता रखते हैं। ऐंसा नहीं कि किसी सरकार को इस तबके की खबर नहीं है, इसके बाद भी इनके लिये आज तक सरकारों द्वारा कोई कारगर कदम नहीं उठाये गये हैं। ऐंसा नहीं कि सरकार ने इनके लिये कोई कानून नहीं बनाये हैं। श्रम कानून के अंतर्गत आने वाले इस तबके को आज तक श्रम कानून का कोई लाभ नहीं दिया गया।
सरकार को अपने कर्मचारियों पर मेहरबान होने का पूरा हक है, परंतु उसकी ही जनता की अनदेखी आखिर क्यों। आखिर इन लोगों का कसूर क्या है, कि अगर उनको सरकारी नौकरी नहीं मिली और वह अपना गुजारा करने 4-5 हजार रूपये प्रतिमाह से किसी फर्म या संस्था में काम करने लगे, क्या इनको इनका हक नहीं मिलना चाहिये। इस पर कौन विचार करेगा, यह सोचनीय पहलू है। 

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