ये कैसी देशभक्ति
एक समय था जब देशभक्ति की एक परिभाषा हुआ करती थी, जिसमें लोग अपने देश के लिये मरने-मिटने तक को तैयार रहते थे। परंतु विगत वर्षों ने इस परिभाषा को बदल कर रख दिया है। सही मायने में देशभक्ति की मिशाल देने वाले ही नहीं रहे हैं। हाल में कुछ घटनायें ऐंसी हुई हैं जिन पर देश में बवाल मच गया था। सबसे पहली घटना वरिष्ठ समाजसेवी अन्ना हजारे जी का आंदोलन। जिसमें उन्होंने एक पार्टी को जन्म दे दिया। वही पार्टी आज आमआदमी की जगह खास आदमी बनकर लोगों को उल्लू बनाने का काम कर रही है। दूसरी घटना निर्भया काण्ड जिसने पूरे देश को झकझौर कर रख दिया। तीसरी घटना अखलाक बीफ काण्ड जिसने पूरे उत्तरप्रदेश में दंगे करवा दिये। ये महज घटनाऐं थीं लेकिन इसे मीडिया ने इतना परोसा कि आम-आदमी भी गुस्से में आग बबूला हो गया। इन घटनाओं में जहां बुद्धिजीवियों तथा मानवता वादी संगठनों ने उनको मिले पुरूस्कार तक वापिस करवा दिये। यह कहा जाने लगा कि हिन्दुस्तान में रहना खतरे से खाली नहीं है। ये वही बुद्धिजीवी हैं जिन्हें सिर्फ एक समुदाय विशेष पर हो रहे अत्याचार की कहानी परोसनी है, ताकि इनका मतलब सिद्ध हो सके। वहीं दूसरी ओर लगातार हमारे सैनिक शहीद हो रहे हैं, सीमा पर तैनात होकर हमारे देश और हमारी रक्षा कर रहे हैं, उन पर हमले हो रहे हैं, इनके लिये किसी भी पार्टी या बुद्धिजीवी कभी एक मोमबत्ती अपने घर पर नहंीं जलाता क्यों? क्या शहीद होने वाले जवान किसी के बेटे या पिता नहीं हैं। या फिर उनकी मौत पर अफसोस करने से इनको शोहरत नहीं मिलेगी।
ऐंसी ही घटना जिस दिन पांच राज्यों के चुनाव नतीजे घोषित हुये उसी दिन घटी जब छत्तीसगढ़ के नक्सली प्रभावित क्षेत्र सुकमा घात लगाकर किये गये नक्सली हमले में 11 जवान शहीद हो गये। पांच राज्यों के चुनावों में मीडिया इतनी मशगूल हो गई कि वह इस खबर को ही नहीं दिखा पाई, वहीं रही सही कसर प्रिंट मीडिया ने पूरी कर दी जब घटना को सिंगल कालम और डबल कालम की खबर बनाकर प्रकाशित कर दी। कई प्रमुख अखबारों ने तो इसे लिया ही नहीं। वहीं किसी भी बुद्धिजीवी या पुरूस्कार लौटाने वाले महानुभावों ने इस घटना पर एक प्रतिक्रिया तक व्यक्त नहीं की। इससे उनकी देशभक्ति का एहसास होता है।
सुकमा में शहीद हुये सेना के सभी जवानों को मेरा सलाम... श्रंद्धाजलीं
संजय साहू पत्रकार
एक समय था जब देशभक्ति की एक परिभाषा हुआ करती थी, जिसमें लोग अपने देश के लिये मरने-मिटने तक को तैयार रहते थे। परंतु विगत वर्षों ने इस परिभाषा को बदल कर रख दिया है। सही मायने में देशभक्ति की मिशाल देने वाले ही नहीं रहे हैं। हाल में कुछ घटनायें ऐंसी हुई हैं जिन पर देश में बवाल मच गया था। सबसे पहली घटना वरिष्ठ समाजसेवी अन्ना हजारे जी का आंदोलन। जिसमें उन्होंने एक पार्टी को जन्म दे दिया। वही पार्टी आज आमआदमी की जगह खास आदमी बनकर लोगों को उल्लू बनाने का काम कर रही है। दूसरी घटना निर्भया काण्ड जिसने पूरे देश को झकझौर कर रख दिया। तीसरी घटना अखलाक बीफ काण्ड जिसने पूरे उत्तरप्रदेश में दंगे करवा दिये। ये महज घटनाऐं थीं लेकिन इसे मीडिया ने इतना परोसा कि आम-आदमी भी गुस्से में आग बबूला हो गया। इन घटनाओं में जहां बुद्धिजीवियों तथा मानवता वादी संगठनों ने उनको मिले पुरूस्कार तक वापिस करवा दिये। यह कहा जाने लगा कि हिन्दुस्तान में रहना खतरे से खाली नहीं है। ये वही बुद्धिजीवी हैं जिन्हें सिर्फ एक समुदाय विशेष पर हो रहे अत्याचार की कहानी परोसनी है, ताकि इनका मतलब सिद्ध हो सके। वहीं दूसरी ओर लगातार हमारे सैनिक शहीद हो रहे हैं, सीमा पर तैनात होकर हमारे देश और हमारी रक्षा कर रहे हैं, उन पर हमले हो रहे हैं, इनके लिये किसी भी पार्टी या बुद्धिजीवी कभी एक मोमबत्ती अपने घर पर नहंीं जलाता क्यों? क्या शहीद होने वाले जवान किसी के बेटे या पिता नहीं हैं। या फिर उनकी मौत पर अफसोस करने से इनको शोहरत नहीं मिलेगी।
ऐंसी ही घटना जिस दिन पांच राज्यों के चुनाव नतीजे घोषित हुये उसी दिन घटी जब छत्तीसगढ़ के नक्सली प्रभावित क्षेत्र सुकमा घात लगाकर किये गये नक्सली हमले में 11 जवान शहीद हो गये। पांच राज्यों के चुनावों में मीडिया इतनी मशगूल हो गई कि वह इस खबर को ही नहीं दिखा पाई, वहीं रही सही कसर प्रिंट मीडिया ने पूरी कर दी जब घटना को सिंगल कालम और डबल कालम की खबर बनाकर प्रकाशित कर दी। कई प्रमुख अखबारों ने तो इसे लिया ही नहीं। वहीं किसी भी बुद्धिजीवी या पुरूस्कार लौटाने वाले महानुभावों ने इस घटना पर एक प्रतिक्रिया तक व्यक्त नहीं की। इससे उनकी देशभक्ति का एहसास होता है।
सुकमा में शहीद हुये सेना के सभी जवानों को मेरा सलाम... श्रंद्धाजलीं
संजय साहू पत्रकार
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